उज्जैन। उच्च पदों पर आसीन रहकर भौतिक सुख सुविधाओं का त्याग करना अपने आप में कठिन मार्ग है। इसे चुनकर व्यक्ति अपने आत्मकल्याण के साथ पूरे समाज को कृतार्थ करता है। कुछ ऐसे ही उद्गार रत्न मुनि ने अभ्युदयपुरम प्रणेता आचार्य डॉ. मुक्ति सागर के सान्निध्य में हुई गुणानुवाद सभा में व्यक्त किए। दीक्षा लेने से पहले मुनि मलय सागर (महेंद्र सिरोलिया) खाराकुआ स्थित ऋषभ देव छगनीराम पेढ़ी ट्रस्ट के 25 साल तक अध्यक्ष रहे।

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