उज्जैन। अष्टावक्र जयंती मनाई गई। उद्वालक ऋषि के पुत्र का नाम श्वेतकेतु था। उद्दालक ऋषि के एक शिष्य का नाम कहोड़ था। कहोड़ को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान देने के बाद उद्दालक ऋषि ने अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या सुजाता का विवाह कर दिया। कुछ दिनों के बाद सुजाता गर्भवती हो गई। एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे तो गर्भ के भीतर से बालक ने कहा कि पिताजी! आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं। यह सुनते ही कहोड़ क्रोधित होकर बोले कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है इसलिये तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जाएगा। एक दिन कहोड़ राजा जनक के दरबार में जा पहुँचे। वहाँ बंदी से शास्त्रार्थ में उनकी हार हो गई। हार हो जाने के फलस्वरूप उन्हें जल में डुबा दिया गया। इस घटना के बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता के न होने के कारण वह अपने नाना उद्दालक को अपना पिता और अपने मामा श्वेतकेतु को अपना भाई समझता था। एक दिन जब वह उद्दालक की गोद में बैठा था तो श्वेतकेतु ने उसे अपने पिता की गोद से खींचते हुए कहा कि हट जा तू यहाँ से, यह तेरे पिता का गोद नहीं है। अष्टावक्र को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने तत्काल अपनी माता के पास आकर अपने पिता के विषय में पूछताछ की। माता ने अष्टावक्र को सारी बातें सच-सच बता दीं। राजा जनक ने अष्टावक्र की परीक्षा लेने के लिए पूछा कि वह पुरुष कौन है जो तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अक्षरों वाली वस्तु का ज्ञानी है? राजा जनक के प्रश्न को सुनते ही अष्टावक्र बोले कि राजन्! चौबीस पक्षों वाला, छ: ऋतुओं वाला, बारह महीनों वाला तथा तीन सौ साठ दिनों वाला संवत्सर आपकी रक्षा करे। अष्टावक्र का सही उत्तर सुनकर राजा जनक ने फिर प्रश्न किया कि वह कौन है जो सुप्तावस्था में भी अपनी आँख बन्द नहीं रखता? जन्म लेने के बाद भी चलने में कौन असमर्थ रहता है? कौन हृदय विहीन है? और शीघ्रता से बढ़ने वाला कौन है? अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि हे जनक! सुप्तावस्था में मछली अपनी आँखें बंद नहीं रखती। जन्म लेने के बाद भी अंडा चल नहीं सकता। पत्थर हृदयहीन होता है और वेग से बढ़ने वाली नदी होती है। अष्टावक्र के उत्तरों को सुकर राजा जनक प्रसन्न हो गए। बंदी ने अष्टावक्र से कहा कि एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, देवराज इंद्र ही वीर हैं तथा यमराज भी एक है। अष्टावक्र बोले कि इंद्र और अग्निदेव दो देवता हैं। नारद तथा पर्वत दो देवर्षि हैं। अश्वनीकुमार भी दो ही हैं। रथ के दो पहिए होते हैं और पति-पत्नी दो सहचर होते हैं। बंदी ने कहा कि संसार तीन प्रकार से जन्म धारण करता है। तीनों काल में यज्ञ होता है तथा तीन लोक और तीन ज्योतियां हैं। अष्टावक्र बोले कि आश्रम चार हैं, वर्ण चार हैं, दिशाएं चार हैं और ओंकार, आकार, उकार तथा मकार ये वाणी के प्रकार भी चार हैं। बंदी ने कहा कि यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं। पंच दिशाओं की अप्सराएं पांच हैं। पवित्र नदियाँ पांच हैं तथा पंक्ति छंद में पांच पद होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दक्षिणा में छ: गोएं देना उत्तम है, ऋतुएं छ: होती हैं। मन सहित इंद्रियां छ: हैं, कृतिकाएं छ: होती हैं और साधस्क भी छ: ही होते हैं। इस प्रकार शास्त्रार्थ में बंदी की हार हो जाने पर अष्टावक्र ने कहा कि राजन्! यह हार गया है, अतएव इसे भी जल में डुबो दिया जाए। तब बंदी बोला कि हे महाराज! मैं वरुण का पुत्र हूं और मैंने सारे हारे हुए ब्राह्मणों को अपने पिता के पास भेज दिया है। बंदी के इतना कहते ही बंदी से शास्त्रार्थ में हार जाने के बाद जल में डुबोए गए सारे ब्राह्मण जनक की सभा में आ गए जिनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे।
अष्टावक्र ने अपने पिता के चरणस्पर्श किए। तब कहोड़ ने प्रसन्न होकर कहा कि पुत्र- तुम जाकर समंगा नदी में स्नान करो। उसके प्रभाव से तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे। तब अष्टावक्र ने समंगा नदी में स्नान किया और उसके सारे वक्र अंग सीधे हो गए।
