उज्जैन। ऐतिहासिक दृष्टि से भगवान बुद्ध के समय 563 ई. पूर्व जब उज्जैन को अवंति पुकारते, राजा प्रदोत राज करते थे। एक बार राजा प्रदोत ने असाध्य पांडुरोग होने पर मगधराज बिंबसार के राजवैध जीवक को अवंति बुलाकर औषधि ली। स्वस्थ होने पर उन्हें कीमती दुशाला तथा अन्य उपहार दिए। चूंकि जीवक भगवान बुद्ध के भी वैध थे वह कीमती दुशाला जीवक ने भगवान बुद्ध को भेंट कर दी। राजा चंड प्रद्योत ने जीवक को इलाज के लिए उज्जैन बुलाया। राजा क्रोधी था, जीवक यह बात जानता था। इसलिए वह जंगल से राजा के लिए औषधि लाने का बहाना बनाकर भद्रावती हथिनी को लेकर भाग गया। जैसे ही राजा ने दवा खाई तो तेज उल्टियां शुरू हो गईं। उन्होंने जीवक को सामने लाने का आदेश दिया। कुछ समय बाद चंड प्रद्योत पूरी तरह से स्वस्थ हो गए और उन्होंने जीवक को शिवायक वस्त्रों की एक बहुत महंगी जोड़ी राजगृह भेजकर पुरस्कृत किया। जीवक का एक बड़ा आवास था। यहां भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ रुके थे। जीवक ने ही अजातशत्रु का परिचय गौतम बुद्ध से कराया। चरक, कश्यप, धन्वंतरि, वाग्भट्ट आदि जैसी कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने जीवक का अनुसरण किया। जीवक की विरासत को चिकित्सा का स्कूल नहीं मिला और न ही उनके तरीकों को लोकप्रिय बनाया गया। इस घटना की जानकारी राजा प्रधोत को हुई। वह बुद्ध के दर्शनों को अधीर हो उठे। जब बुद्ध ना आ सके तब सद्धम्म का उपदेश ले बौद्धभिक्खु बनकर अवंति लौटे तो तेलप्पऍनालि ग्राम (आधुनिक तराना) की गरीब उपासिका ने अपने लंबे केश बेचकर उन्हें भोजन दान कराया। इसी ख्याति से प्रेरित हो राजा प्रधोत ने उसे अपनी रानी बना लिया। और वह उनके पुत्र गोपाल की मां बनकर, गोपाल माता प्रसिद्ध हुई। उज्जैन में महाकाच्चायन ने भिक्खुसंघ की स्थापना की। सोणकुटिकण्ण अवंति ( उज्जयनि के आधुनिक सोढ़ग ग्राम के निवासी) के एक धनी सेठ के पुत्र थे। सोणकुटिकण्ण ने अवंति प्रदेश की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भगवान बुद्ध से भिक्खुऔं के लिए कुछ सुविधाएं देने की प्रार्थना की थी। अनुमति मिलने पर ये नियम विश्व बौद्ध धम्म के नियम बन गए। बुद्ध के महापरिनिर्वाण (483 ईसा पूर्व )के बाद बंटवारे में उनके चीवर एवं आसंदी अवंति प्रदेश को मिले थे। जिस पर श्रद्धालुओं ने कंचनवन में एक स्तूप का निर्माण किया था। मौर्यकाल में 263 ई. पूर्व के लगभग राजकुमार अशोक की पत्नी देवी ने जो वैश्य व्यापारी वर्ग से थी स्तूप का विस्तार किया। जिसे आज भी स्थानीय लोग वैश्य टेकरी बौद्ध महायस्तूप के नाम से पुकारते हैं। बौद्ध उपासक उपासिकाएं स्नान कर उपसंपदा ग्रहण करते थे । 20 अगस्त 641 ईसवी में व्हेनसान्ग जब उज्जयिनी की यात्रा पर थे तब उन्होंने इस महास्तूप का वर्णन करते हुए लिखा है कि नगर के थोड़ी दूर पर एक स्तूप है जहां कोई 300 भिक्खु हैं जो बौद्ध धम्म के हीनयान और महायानों का अध्ययन करते हैं।
बौद्ध धर्म के अनुसार चार मुख्य सच्चाइयोंको हमेशा याद रखना चाहिए। यह सच्चाइयां ही बौद्ध धर्म के आधार हैं। बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग में कहा संयक दृष्टि, संयक संकल्प, वाक, कर्म, आजीव, व्यायाम. स्मृति व समाधि। भगवान बुद्ध के अनुसार पवित्र जीवन बिताने के लिए मनुष्य को दोनों प्रकार की अति से बचना चाहिए। बुद्ध ने ईश्वर और आत्मा दोनों को नहीं माना। वे हमेशा अपने शिष्यों से कहा करते थे कि उन्होंने किसी नए धर्म की स्थापना नहीं की है। उन्होंने अपने विचार लोगों को अपनी ही भाषामें समझाए।
