उज्जैन। एक प्रकाशित दीपक हजारों दीपों को प्रकाशमान कर देता है। हमेशा प्रसन्न रहो। प्रसन्न चित चेहरा सभी को आनंदित करता है। कमल के समान खिलना सीखो, महकना सीखो। चंदन के समान सुगंधित बनो। मिश्री की भांति मीठे बनो। यह बात आचार्य विशुद्ध सागर ने धर्मसभा में कही। पवन बोहरा एवं पलाश लोहाड़िया ने बताया कि पाद प्रक्षालन अशोक मंगलम परिवार ने किया। संचालन अनिल गंगवाल ने किया। जानकारी प्रदीप झांझरी ने दी। आचार्यश्री ने कहा कि बांस से ही लाठी बनती है और बांस से ही मधुर बांसुरी बनती है। मन भावन ध्वनि देने वाली बांसुरी बनो।
