उज्जैन। राष्ट्रसंत ललितप्रभ सागर ने कहा कि इस जिंदगी को हम भुनभुनाते हुए नहीं गुनगुनाते हुए जीएं। मैं यह जीवन आह-आह करके नहीं वाह-वाह कहते जीऊंगा। अगर हमारे लिए थाली में भोजन आया है तो शुक्रिया अदा करो। आज से 50 साल पहले लोगों के पास भौतिक सुख भले कम था पर  सुकून बहुत था। आज आदमी की जिंदगी कैसी गजब की हो चुकी है, बेडरूम में एसी और दिमाग में हीटर। संत प्रवर मंगलवार को अवंति पार्श्वनाथ जैन तीर्थ की दो दिवसीय प्रवचन माला के शुभारंभ पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पत्थर में ही प्रतिमा छिपी होती है। जरूरत केवल उसे हमें तराशने की है।

राष्टसंत ने जीवन के मर्म को सुगम-बोधगम्य शैली में समझाया। संतप्रवर ने सफलता और शांति के मायने समझाते हुए जीने की राह बताई। संतप्रवर ने कहा कि जिंदगी जीने के दो तरीके हैं- या तो जो खोया है, उसका रोना राओ, या जो बचा है उसका आनंद मनाओ। तय आपको करना है। जीवन का यह सिद्धांत बना लें कि जो मेरा है वो जाएगा नहीं और जो चला गया वो मेरा था ही नहीं। इस मंत्र को लेकर जो जीवन जीता है, वह जिंदगी में कभी दुखी नहीं होता। सुख आए तो हंस लो, और दुख आए तो हंसी में टाल दो- यही जीवन का मूलमंत्र है।

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